मंगलवार, 11 अगस्त 2026HI
भारत संस्करण
भारत

न्यायाधिकरणों में 5.36 लाख मामले लंबित, सुधार विधेयक पर जोर

पूर्व सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश जस्टिस ए.के. सीकरी के लेख के मुताबिक न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 समान कार्यकाल, तय सेवानिवृत्ति आयु और सतत चयन प्रक्रिया के जरिये देरी की जड़ पर प्रहार करता है।

न्यायाधिकरणों में 5.36 लाख मामले लंबित, सुधार विधेयक पर जोर
फोटो: Subhashish Panigrahi · CC BY-SA 4.0

देश के न्यायाधिकरणों में लंबित मामलों का आंकड़ा और खाली पदों की समस्या फिर चर्चा में है। लोकसभा में दिए गए जवाब के मुताबिक 2025 में 16 प्रमुख न्यायाधिकरणों में 5.36 लाख मामले लंबित थे। इनमें सबसे ज्यादा 2.45 लाख मामले ऋण वसूली अधिकरणों में थे।

पूर्व सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश जस्टिस ए.के. सीकरी ने अपने लेख में लिखा है कि यह कानून की नाकामी नहीं, बल्कि क्षमता की नाकामी है।

एवीजे हाइट्स का उदाहरण

लेख में एवीजे हाइट्स के फ्लैट मालिकों का मामला उदाहरण के रूप में दिया गया है। बिल्डर एवीजे डेवलपर्स के खिलाफ 2019 में दिवाला प्रक्रिया शुरू हुई। लेनदारों ने 4 जुलाई 2024 को पुनरुद्धार योजना को मंजूरी दी और आठ दिन बाद योजना राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) के सामने पहुंच गई, लेकिन दो साल बाद भी मामला वहीं अटका रहा।

अप्रैल 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस फाइल पर संज्ञान लेते हुए पूरे देश के आंकड़े मंगवाए। सामने आया कि देशभर की एनसीएलटी पीठों के सामने पुनरुद्धार योजनाओं की मंजूरी के 383 आवेदन लंबित थे और देरी 48 दिन से 738 दिन तक थी। दिवाला एवं दिवालियापन संहिता में ऐसे मामलों के लिए 330 दिन की अधिकतम समयसीमा तय है।

रिक्तियां और देरी

लेख के मुताबिक रिक्तियां महज प्रशासनिक समस्या नहीं हैं — कोरम के बिना पीठ बैठ नहीं सकती और जिस मामले की सुनवाई के लिए पीठ उपलब्ध न हो, वह सुना भी नहीं जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई में पदों को भरने में सरकार की सुस्ती पर टिप्पणी की थी। लेखक का कहना है कि इसका जवाब कोई नया आश्वासन नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था है जिसमें देरी दिखे और जिम्मेदारी तय हो।

विधेयक में क्या प्रस्ताव है

न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 में कार्यकाल पांच वर्ष तय करने तथा अध्यक्ष के लिए 70 और सदस्य के लिए 67 वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु निर्धारित करने का प्रस्ताव है। लेख के अनुसार यह मद्रास बार एसोसिएशन से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के तय मानकों के अनुरूप है; नवंबर 2025 में अदालत चार वर्ष के कार्यकाल और 50 वर्ष की न्यूनतम आयु से जुड़े प्रावधानों को रद्द कर चुकी है।

विधेयक में चयन को सतत प्रक्रिया बनाने की बात है। स्थायी सचिवालय रिक्तियों पर नजर रखेगा, पदों का विज्ञापन करेगा और पात्रता की जांच करेगा। अहम बात यह है कि प्रशासनिक मंत्रालय, जो अक्सर इन्हीं न्यायाधिकरणों के सामने सबसे बड़ा वादी होता है, इस जांच से बाहर रहेगा।

जस्टिस सीकरी अप्रैल 2013 से मार्च 2019 तक सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश रहे और वर्तमान में सिंगापुर इंटरनेशनल कमर्शियल कोर्ट (SICC) में अंतरराष्ट्रीय जज हैं।

यह लेख हमारी संपादकीय नीति के अनुसार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सहायता से तैयार किया गया है।

न्यायाधिकरण सुधार विधेयकएनसीएलटीलंबित मामलेसर्वोच्च न्यायालयदिवाला एवं दिवालियापन संहिताजस्टिस ए.के. सीकरी
न्यायाधिकरणों में 5.36 लाख मामले लंबित, सुधार विधेयक पर जोर | Indian Dispatch