यूपीआई पर एमडीआर लगेगा? आरबीआई गवर्नर बोले— लागत किसी न किसी को उठानी होगी
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था चलाने की लागत का भुगतान किसी को करना होगा, लेकिन एमडीआर पर कुछ कहना अभी जल्दबाजी है।

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को कहा कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) जैसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में जो लागत आती है, उसका भुगतान किसी न किसी को करना होगा।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस लागत का बोझ जरूरी नहीं कि आम उपभोक्ताओं पर ही डाला जाए।
मुंबई में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गवर्नर से यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) या कमीशन लगाए जाने की संभावना को लेकर सवाल पूछा गया था। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि इस विषय पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
एमडीआर क्या है
मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर व्यापारी से लिया जाता है। यूपीआई लेनदेन पर फिलहाल यह शुल्क नहीं लगता, और इसी वजह से देश में इस भुगतान माध्यम का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।
गवर्नर के बयान से यह संकेत मिलता है कि भुगतान व्यवस्था की लागत की भरपाई का सवाल नीति-निर्माताओं के सामने बना हुआ है, लेकिन आरबीआई ने इस पर किसी फैसले की घोषणा नहीं की है। मल्होत्रा के जवाब में न तो किसी प्रस्तावित दर का जिक्र था, न ही किसी समयसीमा का।
अभी यूपीआई के जरिये किए जाने वाले भुगतान उपभोक्ताओं के लिए निशुल्क हैं। गवर्नर के बयान के बाद यह चर्चा तेज हुई है कि आगे लागत का बोझ किस पर आएगा — व्यापारियों पर, बैंकों पर, भुगतान सेवा कंपनियों पर या सरकार पर। इस पर आरबीआई की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव सामने नहीं रखा गया है।
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